माँ
May 9, 2010 at 1:30 pm 2 comments
आकाश के सद्रश
पकड़ने चला माँ के आँचल को..
सोचा बटोर लू ममत्व के सब ताने बाने ..
और बसा लू दुनिया माँ के आँचल में ..
खीछु पल्लू का वह कोना ..
जिसे पकड़ में बड़ा हुआ ..
वह दुन्धाला सा बचपन जब माँ ही सच थी..
जिससे सीखी हर लकीर पत्थर की..
उनकी उस साडी से आखर जोडू
जिससे लिपट में इठलाता था..
कभी सामने आता कभी छुप जाता था.
बंद आँखों से भी
माँ को ही सामने पाता ..
जब कभी माँ का ना होना
बैचेन कर देता था..
हर घडी हर पल
माँ का होना अच्छा लगता था..
पल दो पल को भी न
ओझल होने दू …
लिपट कर माँ के गले ..
सारी दुनिया को खो दू…
इन अनगिनत बातो का
कैसे पाऊ कोई कोना
मुश्किल नही ….. असंभव
अपार प्यार का
व्यक्त शब्दों में होना …
- अमित
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1.
Poo | May 9, 2010 at 5:16 pm
Great amit,
Apne kuch words me wo sab kuch keh diya jo hum sab apni maa k liye sochte he simply GREAT.
THNX ALOT
2.
amitkumarpaliwal | May 9, 2010 at 5:36 pm
thanks poo.. I think words can not define importance of maa in our lives…
Thanks to god that give us our god – “Maa”.